माँ गंगा पूजन एवं गंगा दशहरा / पूर्णिमा दीपदान विधि
Maa Ganga Pooja & Deepdaan Vidhi
शिव की जटाओं से अवतरित होकर समस्त जगत का उद्धार करने वाली पतितपावनी माँ गंगा की आराधना जीवन के समस्त पापों, संतापों और पूर्वजन्म के दोषों का तत्काल शमन करती है।
🌸 पावन भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व:
माँ गंगा केवल एक नदी नहीं, साक्षात् मोक्षदायिनी भगवती हैं। उनकी आराधना से मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तीनों प्रकार के ताप शांत होकर परम शांति प्राप्त होती है।
💡 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
❓ गंगा दशहरा किस तिथि को मनाया जाता है?
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को माँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था, जिसे गंगा दशहरा के रूप में अत्यंत हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
❓ गंगाजल कभी खराब क्यों नहीं होता?
धार्मिक रूप से गंगाजल में साक्षात् अमृत तत्व और वैज्ञानिक रूप से इसमें प्रचुर मात्रा में बैक्टेरियोफेज वायरस होते हैं जो जल को सदैव शुद्ध रखते हैं।
🪔 प्रभु वंदन की दृष्टि से: एक बड़े दीपक की जगह सौ छोटे दीप
गंगा पूजन में 108 दीपदान की परंपरा विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है — यहाँ एक विशाल, भव्य दीपक जलाने के बजाय अनेक छोटे-छोटे दीपकों को प्रवाहित करने पर बल दिया गया है।
यह प्रतीकात्मकता एक व्यावहारिक सत्य की ओर इशारा करती है — जीवन के बड़े भार, पाप या चिंताएं प्रायः एक ही बड़े प्रयास से दूर नहीं होतीं, बल्कि अनेक छोटे, निरंतर किए गए सकारात्मक कार्यों से धीरे-धीरे हल्की होती हैं। सौ दीपकों का प्रवाह इसी क्रमिक, संचयी शुद्धि का प्रतीक है।
नदी के प्रवाह के साथ दीपकों का बहना भी सार्थक है — यह हमें सिखाता है कि कुछ भार या बोझ को जबरन रोकने के बजाय, स्वाभाविक प्रवाह के साथ धीरे-धीरे छोड़ देना ही सच्ची मुक्ति है।
आज का पंचांग एवं शुभ मुहूर्त
पूजा एवं व्रत के लिए आज की शुभ तिथि, अभिजित मुहूर्त एवं चौघड़िया देखें।

