भगवान श्रीकृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता कुल श्लोक: 29

अध्याय ५: कर्मसंन्यासयोग

Karma Sanyasa Yoga

मूल विषय: संन्यास और कर्मयोग का समन्वय, आत्मसंयम और परम शांति

📖 संपूर्ण अध्याय पाठ:

अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि

पंचम अध्याय में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्मयोग और ज्ञानयोग वस्तुतः एक ही लक्ष्य तक पहुंचाते हैं। जो व्यक्ति कर्मफल को ईश्वर को समर्पित करके कर्म करता है, वह जल में कमल के पत्ते की भांति पाप से अलिप्त रहता है।

अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक

श्लोक संग्रह #1 संस्कृत मूल
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ (५.१०)
हिंदी भावार्थ: जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह जल में कमल के पत्ते के समान पाप से लिप्त नहीं होता।
श्लोक संग्रह #2 संस्कृत मूल
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥ (५.१८)
हिंदी भावार्थ: ज्ञानी महापुरुष विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल में भी समदर्शी (परमात्मा रूप) होते हैं।

दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख

🪔 प्रभु वंदन की दृष्टि से: त्याग का अर्थ है भीतर से अलिप्त रहना, बाहर से भागना नहीं

पाँचवां अध्याय एक ऐसे प्रश्न का उत्तर देता है जो आज भी बहुत लोगों के मन में उठता है — क्या आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए संसार से सब कुछ छोड़ देना आवश्यक है? श्रीकृष्ण का उत्तर स्पष्ट है: कर्मयोग और सांख्ययोग (ज्ञानमार्ग) अंततः एक ही लक्ष्य तक पहुंचाते हैं, और सामान्य व्यक्ति के लिए सक्रिय रहते हुए अनासक्त भाव से जीना कहीं अधिक सहज और सार्थक है बजाय सब कुछ त्यागकर एकांतवास करने के।

कमल के पत्ते का रूपक यहाँ विशेष रूप से उपयोगी है — पानी में रहकर भी पत्ता भीगता नहीं। आज के व्यावसायिक और पारिवारिक जीवन में भी यही संतुलन चाहिए: पूरी निष्ठा से काम में संलग्न रहना, परन्तु परिणाम को अपने आत्मसम्मान या पहचान से इस तरह न जोड़ना कि एक असफलता पूरे व्यक्तित्व को हिला दे।

इस अध्याय की एक गहरी सीख यह भी है कि बाहरी संन्यास (इंद्रियों से विषयों को दूर रखना) तब तक अधूरा है जब तक मन के भीतर से आसक्ति समाप्त न हो। यही कारण है कि केवल आदतें बदलने से स्थायी शांति नहीं मिलती — जब तक भीतर का लगाव न बदले, बाहरी परिवर्तन अस्थायी ही रहते हैं।

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