भगवान श्रीकृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता कुल श्लोक: 24

अध्याय १६: दैवासुरसम्पद्विभागयोग

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

मूल विषय: दैवी संपदा (सद्गुण) और आसुरी संपदा (दुर्गुण) का भेद

📖 संपूर्ण अध्याय पाठ:

अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि

सोलहवें अध्याय में मानव स्वभाव के दो पक्षों का स्पष्ट विभाजन किया गया है—दैवी संपदा (अभय, सत्य, अहिंसा, दान, दया, तेज) जो मोक्ष की ओर ले जाती है, और आसुरी संपदा (दम्भ, दर्प, क्रोध, कठोरता, अज्ञान) जो पतन की ओर ले जाती है। काम, क्रोध और लोभ को आत्मा के नाश का तीन द्वार बताया गया है।

अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक

श्लोक संग्रह #1 संस्कृत मूल
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥ (१६.२१)
हिंदी भावार्थ: काम, क्रोध तथा लोभ—ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले (पतन कराने वाले) हैं, अतः इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए।
श्लोक संग्रह #2 संस्कृत मूल
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ (१६.२४)
हिंदी भावार्थ: इसलिए क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य, इसकी व्यवस्था में शास्त्र ही तुम्हारे प्रमाण हैं। शास्त्र के विधान को जानकर ही तुम्हें कर्म करना चाहिए।

दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख

🪔 प्रभु वंदन की दृष्टि से: पतन के तीन द्वार — और उन्हें पहचानने की सरलता

सोलहवें अध्याय में दैवी और आसुरी संपदा का विभाजन पहली नज़र में अच्छे और बुरे लोगों के बीच का भेद लग सकता है, परन्तु गहराई से देखें तो यह हर व्यक्ति के भीतर मौजूद दो प्रवृत्तियों का वर्णन है — ये कोई स्थायी श्रेणियाँ नहीं, बल्कि हमारे दैनिक चुनावों की दिशा हैं।

काम, क्रोध और लोभ को आत्मा के नाश के तीन द्वार कहना इस अध्याय की सबसे व्यावहारिक और समयातीत शिक्षा है। यह तीनों आज भी ठीक वैसे ही कार्य करते हैं जैसे हज़ारों वर्ष पहले करते थे — अनियंत्रित इच्छा निराशा को जन्म देती है, निराशा क्रोध को, और अतृप्त लोभ संबंधों व नैतिकता दोनों को क्षति पहुंचाता है। इन तीनों को पहचानना ही आत्म-नियंत्रण की पहली सीढ़ी है।

यह अध्याय हमें आत्म-निरीक्षण का एक सरल किन्तु प्रभावी प्रश्न देता है — क्या मेरा वर्तमान निर्णय अभय, सत्य और करुणा से प्रेरित है, या दंभ, क्रोध और स्वार्थ से? यह प्रश्न किसी जटिल दार्शनिक विश्लेषण की आवश्यकता नहीं रखता, बल्कि रोज़मर्रा के छोटे-छोटे निर्णयों में भी लागू किया जा सकता है।

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