भगवान श्रीकृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता कुल श्लोक: 34

अध्याय १३: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga

मूल विषय: शरीर (क्षेत्र) और आत्मा/परमात्मा (क्षेत्रज्ञ) का यथार्थ भेद

📖 संपूर्ण अध्याय पाठ:

अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि

त्रयोदश अध्याय में शरीर को 'क्षेत्र' (खेत) और शरीर को जानने वाली चेतन आत्मा को 'क्षेत्रज्ञ' बताया गया है। भगवान ज्ञान के २० साधनों (अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, सरलता आदि) का वर्णन करते हैं और प्रकृति व पुरुष के परस्पर संबंध को उद्घाटित करते हैं।

अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक

श्लोक संग्रह #1 संस्कृत मूल
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥ (१३.१)
हिंदी भावार्थ: हे कुंतीपुत्र! यह शरीर 'क्षेत्र' (कर्मभूमि) कहलाता है, और जो इसको जानता है, उसे तत्वज्ञानी महापुरुष 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा) कहते हैं।
श्लोक संग्रह #2 संस्कृत मूल
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्। विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ (१३.२७)
हिंदी भावार्थ: जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में अविनाशी परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही वास्तव में सत्य को देखता है।

दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख

🪔 प्रभु वंदन की दृष्टि से: मैं शरीर नहीं, वह हूँ जो शरीर को देखता है

तेरहवें अध्याय में 'क्षेत्र' (शरीर) और 'क्षेत्रज्ञ' (उसे जानने वाली चेतना) के बीच का भेद एक ऐसा विचार है जिसका व्यावहारिक मूल्य आज के मानसिक स्वास्थ्य की समझ से भी मेल खाता है। जब हम अपने विचारों, भावनाओं या परिस्थितियों के साथ अपनी संपूर्ण पहचान जोड़ लेते हैं — 'मैं क्रोधी हूँ', 'मैं असफल हूँ' — तो हम उस अस्थायी अनुभव को ही अपना स्थायी स्वरूप मान बैठते हैं।

गीता यहाँ एक साक्षी-भाव (witness consciousness) का परिचय देती है — यह विचार कि हम वह चेतना हैं जो शरीर, मन और परिस्थितियों को देखती और अनुभव करती है, परन्तु उनसे भिन्न है। यह दृष्टिकोण किसी कठिन परिस्थिति में, जैसे बीमारी, असफलता या आलोचना के समय, एक स्वस्थ दूरी बनाने में सहायक होता है — न अस्वीकृति की दूरी, बल्कि स्पष्टता की दूरी।

ज्ञान के बीस साधनों में अमानित्व (अहंकारहीनता) और अदम्भित्व (पाखंडरहितता) को प्रथम स्थान देना भी सार्थक है — यह दिखाता है कि आत्म-ज्ञान की यात्रा बौद्धिक उपलब्धि से नहीं, बल्कि विनम्रता से शुरू होती है। जितना अधिक हम अपने 'मैं' को छोटा करते हैं, उतना ही स्पष्ट रूप से हम उस चेतना को पहचान पाते हैं जो वास्तव में हम हैं।

← अध्याय 12: Bhakti Yoga 📖 गीता सूची अध्याय 14: Gunatraya Vibhaga Yoga →
📿

नित्य 108 मंत्र जाप साधना

असली रुद्राक्ष मनके के साथ डिजिटल 108 जप माला काउंटर पर मंत्र जाप करें।

जप माला खोलें →
🔍 संबंधित पावन खोजें (Popular Searches):