भगवान श्रीकृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता कुल श्लोक: 47

अध्याय १: अर्जुनविषादयोग

Arjuna Vishada Yoga

मूल विषय: कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में अर्जुन का मोह, करुणा और धर्मसंकट

📖 संपूर्ण अध्याय पाठ:

अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय में महाभारत युद्ध के आरंभिक दृश्य का वर्णन है। दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं। अर्जुन अपने सगे-संबंधियों, गुरुजनों और बांधवों को देखकर मोह और करुणा से व्याकुल हो जाते हैं और अपने गांडीव धनुष को रख देते हैं। यह अध्याय मानव मन के द्वंद्व, विषाद और धर्मसंकट का यथार्थ चित्रण करता है।

अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक

श्लोक संग्रह #1 संस्कृत मूल
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ (१.१)
हिंदी भावार्थ: धृतराष्ट्र ने पूछा: हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
श्लोक संग्रह #2 संस्कृत मूल
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्। सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति॥ (१.२८)
हिंदी भावार्थ: अर्जुन बोले: हे कृष्ण! युद्ध की अभिलाषा से सामने उपस्थित अपने इन स्वजनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है।

दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख

🪔 प्रभु वंदन की दृष्टि से: मोह एक स्वीकृति है, पराजय नहीं

कई बार हम अर्जुन के इस मोह को केवल एक पौराणिक दृश्य मानकर आगे बढ़ जाते हैं, परन्तु ध्यान से देखें तो यह अध्याय आज के हर उस व्यक्ति की कहानी है जो किसी बड़े निर्णय के मुहाने पर खड़ा होकर रुक जाता है — नौकरी बदलनी है या नहीं, कोई रिश्ता निभाना है या नहीं, सच बोलना है या चुप रहना है। अर्जुन कायर नहीं थे; वे अनुभवी और कुशल योद्धा थे। फिर भी जब कर्तव्य और स्नेह आपस में टकराए, तो उनका धनुष हाथ से गिर गया।

यही वह क्षण है जहाँ गीता आरंभ होती है — निर्णय की विफलता से नहीं, बल्कि एक ईमानदार उलझन की स्वीकृति से। आज के दौर में हम प्रायः अपनी दुविधा को छुपाने की कोशिश करते हैं, मानो उलझन दिखाना कमजोरी हो। पर अर्जुन हमें सिखाते हैं कि जब तक हम अपनी सच्ची विषम स्थिति को स्वीकार नहीं करते, तब तक कोई मार्गदर्शन सार्थक नहीं हो सकता। उन्होंने अपना मोह छुपाया नहीं, बल्कि खुलकर कृष्ण से कहा — और यहीं से संवाद का द्वार खुला।

इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में जब भी भ्रम या विषाद घेरे, उसे दबाने के बजाय स्वीकार करें और किसी सुयोग्य मार्गदर्शक अथवा अपनी ही भीतरी सजगता के समक्ष खुलकर रखें — क्योंकि प्रश्न उठाने की ईमानदारी ही उत्तर पाने की पहली शर्त है।

📖 गीता सूची अध्याय 2: Sankhya Yoga →
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